मिट्टी से बने सामानों की मांग घटी, मूर्तियों के आर्डर भी कम, कुम्हारों व मूर्तिकारों में मायूसी*


खरोरा;—— माटी की कला से जुड़कर गुजर-बसर करने वाले कुम्हार और मूर्तिकारों के हुनर अब दांव पर है। क्योंकि इन कलाकारों को मेहनत के अनुरूप मेहनताना नहीं मिल पा रहा है। इसके बावजूद ये लोग संघर्ष और जद्दोजहद की जिंदगी जीने मजबूर है। क्योंकि एक ओर जहां मिट्टी के बने सामानों की मांग घट गई है। तो वहीं इस साल भी मूर्तिकारों को मूर्तियों का आर्डर कम मिल रहा है। जिससे उन्हें नुकसान का सामना करना पड़ रहा है। कोरोना के मद्देनजर जारी गाइडलाइन के तहत इस साल भी बहुत कम जगह पर गणेश मूर्तियां विराजित होगी। पहले जैसे बाजारों मे भी रौनक नहीं है। मिट्टी से बने जांता-पोरा और नंदिया बैला की मांग भी घट गई है। आधुनिकता के चलते कुम्हारों के पुश्तैनी धंधा पर खतरा मंडरा रहा है। बदलते परिवेश और बदलते रूचियों के आगे अब इनका व्यवसाय दम तोड़ रहा है।तीजा-पोला में अपन हाथ के हुनर से दूसरों के चेहरें पर खुशी बिखेरने वाले कुम्हारों के ही चेहरा से खुशी गायब है। तीजा-पोला के मौके पर मिट्टी से बने जांता,पोरा,नंदिया बैला,दीया,चुकिया,मटकी,नांदी,
कलशा और खिलौना आदि की मांग अब कम हो गई हैं। जब से बाजार में लकड़ी और प्लास्टिक के बने जांता,पोरा,बैला,खिलौना आने लगा तब से मिट्टी का खिलौना अपनी अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है। कुम्हार लखन लाल चक्रधारी का कहना है कि वे लोग पहले मिट्टी से सामान बनाकर उन्हें बेचने बाजार और गांव-गांव में जाते थे। बाजार और मेलें मे भी मिट्टी से बने रंग बिरंगें खिलौनों की काफी मांग रहती थी। लेकिन आज बच्चे मिट्टी की जगह प्लास्टिक के खिलौना ज्यादा पसंद कर रहे है। जरूरत के आगे मौन कुम्हार का ठहरे हुए चाक अब समाज के हर व्यक्ति से मिट्टी के बने वस्तुओं की प्रयोग करने की गुजारिश कर रहा है। आने वाले गणेशोत्सव पर्व को लेकर भी तैयारी शुरू हो गई है। मूर्तिकार गणेश मूर्तियां बनाने का काम जोर-शोर से कर रहें है। मूर्तियों को अंतिम रूप देने में मूर्तिकार जुटे हुए है। लेकिन कोरोना को लेकर जारी सख्त गाइडलाइन के कारण इस साल भी मूर्तिकार नाराज है। मूर्तिकार राकेश साहू का कहना है कि नियम सख्त होने के कारण पिछले साल की तरह इस साल भी मूर्तियों के आर्डर कम है। मूर्तियों के बुकिंग कम होने से खर्चा निकाल पाना भी मुश्किल हो रहा है। लिहाजा रोजी-रोटी की समस्या खड़ी हो रही है। नियमों में संशोधन की आवश्यकता है ताकि मूर्तिकार और लोगों को कुछ राहत मिल सके। माटी के कारीगरी कर जीवनयापन करने वाले मूर्तिकार होरीलाल चक्रधारी का कहना है कि महंगाई के बढ़ जाने से रंग रोगन के सामान,मूर्ति श्रृंगार और सजावटी सामान के कीमत में भी बढ़ोतरी हो गई है। जिस कारण मूर्ति निर्माण करने में खर्चा ज्यादा आ रहा है। बाहर से वर्कर और पेंटर काम करने आते है उनकी भी मजदूरी बढ़ गई है। पिछले साल कोरोना के कारण कम जगह मूर्तियां स्थापित हुई थी इसलिए बिक्री भी कम हुआ था। अब डर है कहीं इस साल भी वही नौबत न आ जाए।
लालजी वर्मा की रिपोर्ट….



